Dr. Jai Prakash Gupta
15th December 2008, 09:50 PM
प्रियदर्शिनी, प्रियंवदा, प्रिय मोहिनी, प्रिय सम्पदा
मनभाविनी वाणी से उच्चरित शब्द मानो ब्रह्म के ही वाक्य हैं,
और उच्चारण कराती हो स्वयं ज्यूं शारदा।
प्रेरणा, सद्भावना, शुभ कल्पना, मंगल ध्वनि
कल कल कि जैसे जाह्नवी की धार हो
स्पर्श से कर दे जो पावन, हो पुनीता जलप्रदा॥
हों सुगन्धित सुरभिकण, वातावरण में
वायु से कर लें समन्वय जहां तुम हो;
इन्द्रपद पर स्वयं का आभास हो, ऐसी हो मंगल मोक्षदा।
बसीं अन्तर्मन में मेरे चित्रवत् तुम,
एक क्षण भी ना विलग होता तुम्हारे चित्र से मैं;
क्या मैं दूं संज्ञा इसे तुम ही कहो, क्या हो नहीं तुम प्राणदा?
मनभाविनी वाणी से उच्चरित शब्द मानो ब्रह्म के ही वाक्य हैं,
और उच्चारण कराती हो स्वयं ज्यूं शारदा।
प्रेरणा, सद्भावना, शुभ कल्पना, मंगल ध्वनि
कल कल कि जैसे जाह्नवी की धार हो
स्पर्श से कर दे जो पावन, हो पुनीता जलप्रदा॥
हों सुगन्धित सुरभिकण, वातावरण में
वायु से कर लें समन्वय जहां तुम हो;
इन्द्रपद पर स्वयं का आभास हो, ऐसी हो मंगल मोक्षदा।
बसीं अन्तर्मन में मेरे चित्रवत् तुम,
एक क्षण भी ना विलग होता तुम्हारे चित्र से मैं;
क्या मैं दूं संज्ञा इसे तुम ही कहो, क्या हो नहीं तुम प्राणदा?